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Tag: लोकधारा

जाट कहवै, सुण जाटणी

 प्रदीप नील वशिष्ठ

आत्मकथ्य

एक बात ने कई सालों से मुझे परेशान कर रखा था। और वह शर्म की बात यह कि अपने  हरियाणा में हरियाणवी बोलने वाले को नाक-भौं चढ़ा कर इस नजऱ से देखा जाता है कि इस

लुटी ज्यब खेत्ती बाड़ी

सत्यवीर ‘नाहडिय़ा

रागनी

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माट्टी म्हं माट्टी हुवै, जमींदार हालात।
करजा ले निपटांवता, ब्याह्-छूछक अर भात।
ब्याह्-छूछक अर भात, रात-दिन घणा कमावै।
मांह् -पौह् की बी रात, खेत म्हं खड़ा बितावै।
खाद-बीज का मोल, सदा हे ठावै टाट्टी।
अनदात्ता

अंधविश्वास नाश की राही

रामेश्वर दास ‘गुप्त

रागनी

तर्क करूं अर सच जाणूं, ये रहणी चाहिए ख्यास मनै
अंधविश्वास सै नाश की राही, बात बताणी खास मनै।

भगत और भगवान बीच म्हं, दलाल बैठगे आ कै,
कई भेडिये पहन भेड़ की, खाल बैठगे

 उल्टे खूंटे मतना गाडै मै त्यरै ब्याही आ रही सूं

रामकिशन राठी

(रामकिशन राठी रोहतक में रहते हैं। कहानी लेखक हैं । हरियाणवी भाषा में भी निरतंर लेखन करते हैं और समाज के भूले-बिसरे व अनचिह्ने नायकों पर लेख लिखकर प्रकाश में लाने का महती कार्य करते हैं -सं.)

रागनी