सामंती व्यवस्था से टकराता साहित्यकार

  बी. मदन मोहन,    प्रस्तुति—विकास साल्याण

तीसरे हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान 9 फरवरी 2019 को ‘लेखक से संवाद’ सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें हिमाचल के प्रख्यात साहित्यकार एस.आर. हरनोट के साथ श्रोताओं ने संवाद करना था, लेकिन स्वास्थ्य के चलते वे पहुंच नहीं पाए। एम एल एन कालेज, यमुनानगर में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर बी.मदनमोहन ने उनकी रचनाओं से परिचित करवाया और उनकी रचनाओं के सामाजिक सरोकारों व सौंदर्य-शिल्प पर चर्चा की। प्रस्तुत है विकास साल्याण की रिपोर्ट –

बी मदन मोहन

एस.आर. हरनोट वर्तमान समय के हिमाचल व हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार व साहित्यकर्मी हैं। हिमाचल व देशभर में होने वाली साहित्यिक गतिविधियों से लगातार जुड़े रहते हैं। अब तक उनका एक उपन्यास और छः कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जो निरन्तर चर्चा में रहे हैं। हाल ही में ‘कीलें’ और  ‘लिटन ब्लॉक गिर रहा है’ नामक दो कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ‘लिटन ब्लॉक गिर रहा है’ कहानी संग्रह की चर्चा पूरे हिन्दुस्तान में बड़ी ही गंभीरता के साथ हुई है। उनके रचना-संसार में दो-तीन पक्षों को गहराई से देखने और रेखांकित करने की आवश्यकत्ता है। एक पक्ष तो यह है कि एस.आर. हरनोट बहुत लम्बे समय से साहित्य रचना कर रहे हैं, परन्तु आज से दस वर्ष पहले तक भी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय उन्हें एक लेखक के रूप में स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं था। दूसरा पक्ष यह है कि आज से दस वर्ष पहले हिन्दी के आलोचकों ने भी उनके रचना-संसार का अच्छे से नोटिस में नहीं लिया था, जबकि उनकी रचनाएँ ‘जीन काठी और अन्य कहानियां’, ‘दारोश’ और खासतौर से उनका उपन्यास ‘हिडिम्ब’ महत्वपूर्ण कृतियां हैं।

हिमाचल एक देवभूमि है, वहां के साहित्य में प्रेम-प्रसंग और थोड़ा बहुत संघर्ष दिखाया जाता था हिमाचल प्रदेश की संस्कृति में जो सामंती व्यवस्था के अवशेष बचे हैं और जो शोषण का शिकार वहां का आम-आदमी होता है। हरनोट जी ने अपनी पहली ही कहानी से इस सामंती व्यवस्था से टकराने और उसे तोड़ने की कोशिश की है।

हिमाचली व्यवस्था में बहुत सारी विविधताएं देखने को मिलती हैं। दो तरह की व्यवस्था है एक तरफ तो शोषणकर्ता हैं और दूसरी तरफ शोषित हैं। एस.आर. हरनोट दूसरे वर्ग के साथ खड़े हैं। अपनी पक्षधरता के साथ सामंती ढ़ांचे को तोड़ने का काम किया है।

हिमाचल प्रदेश में परम्पराओं के नाम पर भी बहुत सारा दोहन होता है। कुछ परम्पराएं तो ऐसी हैं जिनके बारे में ज्यादातर लोग परिचित नहीं हैं। मसलन बहुपति प्रथा। किन्नौर के इलाके में यह प्रथा प्रचलित है। एस.आर. हरनोट की कहानी ‘दारोश’ इसी प्रथा पर केन्द्रित है। दारोश का अर्थ है – जबरदस्ती विवाह। ‘दारोश’ कहानी में चार-पांच युवक एक लड़की को जबरदस्ती उठाकर ले जाते हैं। उस लड़की की छोटी बहन इसके खिलाफ लड़ाई लड़ती है और कोर्ट का सहारा लेती है। कोर्ट का फैसला लड़की के हक में आता है। लड़की उस गांव में अकेली जाती है और इस पूरी व्यवस्था से टकराती है और अंततः लोगों को एकजुट करके इस मुहिम में कामयाब होती है।

ये परम्पाएं भीतरी हिमालय के लेह-लद्दाख से चलकर, हिमाचल के किन्नौर जिले में और आगे उत्तराखंड से सिक्किम तक फैली हुई है। इसके अलावा हिमाचल में बहुपति प्रथा भी प्रचलित है। इसमें लड़की परिवार के किसी एक लड़के से विवाह करती है, उसके पश्चात परिवार में सब भाइयों की पत्नी बन जाती है। उसकी संतान का पिता कौन है इसके निर्णय का अधिकार उस महिला का होगा।

हरनोट की विशेषता है कि एक ओर तो वो नागार्जुन की परम्परा को जीते हैं। इनकी कहानियों और उपन्यास में कहीं तो ‘वरूण के बेटे’ उपन्यास की पात्र मदुरई दिखाई देती है, कहीं ‘बलचनमा’ का बलचनमा दिखाई देता है। उनकी कहानी में ‘मिट्टी के लोग’ में उसका मुख्य पात्र मोती तो सरपंच और प्रधान के आगे हथियार डाल देता है और बैंक से जो कर्ज लिया हुआ है उसको न चुकाने की वजह से अपनी गाय प्रधान को सौंप देता है। लेकिन उसकी महिला पात्र दरांती उठा लेती है और कहती है – “कि उसकी क्या हिम्मत जो हमारी गाय को अपने वहां ले गया” वह उसके घर जाती है और दरांती दिखाती हुई गाय को वापिस अपने घर ले आती है। सरपंच और प्रधान इस सारी घटना को खड़े-खड़े देखते रह जाते हैं। गोदान की कथा इसके विपरित है उसमें होरी व धनिया सारे जीवन संघर्ष करते रह जाते है और अंत में धनिया की स्थिति ऐसी नहीं होती कि वह गाय को अपने घर में रख पाए लेकिन हरनोट की कहानी की मंगली गाय को लेकर आती है।

हरनोट अपनी कहानियों में हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों का अति सुन्दर चित्रण करते हैं । उसके साथ वहां के खासकर दलित तबके के लोगों के अभावों और उनके जीवन संघर्ष का गहराई से चित्रण करते हैं। उनके साहित्य में हमें एक नए हिमाचल की तस्वीर दिखाई देती है। एक इंसान के रूप में हरनोट जी जितने विनम्र है, एक साहित्यकार के रूप में वे उतने ही कठोर वे परिस्थितियों से समझौता नहीं करते। अंत में हरनोट जी के व्यक्तित्व के लिए शेर है।

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज़दे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा

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उत्पीड़न घटना नहीं, बल्कि एक विचारधारा है

विकास साल्याण

IMG_0538.jpgसत्यशोधक फाऊंडेशन और डा.ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान, कुरुक्षेत्र की ओर से डा. भीम राव अंबेडकर और जोतिबाफुले के जयंती के उपलक्ष में एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसका विषयमौजूदा दौर में दलित उत्पीड़न के आयाम। इसमें मुख्य वक्ता के तौर पर प्रख्यात दलित चिंतक और जन मीड़िया के संपादक अनिल चमड़िया थे। उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा सविधान सभा के समक्ष भाषण का जिक्र करते हुए अपनी बात की शुरुआत की।उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल की चेतावनी का उल्लेख कियाअपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में समर्पित करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान कर दें कि संस्थाओं को तबाह करने में समर्थ हो जाए। आज भारतीय लोकतंत्र में जिस तरह से नायकों की पूजा हो रही है और जन साधारण की आवाज गुम हो रही है उनकी चेतावनी याद आती है और लोकतंत्र के रक्षकों को अपना कर्तव्य की निभाने की आह्वान कर रही है।

धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति और मोक्ष का मार्ग हो सकता है , लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में भक्ति या नायक पूजा पतन और तानाशाही का मार्ग होता है। उन्होंने कहा ने कि डा. अंबेडकर के विचारों पर हम सीमित दायरे में हम बात करते हैं, इसे तोड़कर एक बड़े दायरे में बात करने की आवश्यकता है। डा. अंबेडकर ने जातपात तोड़क मंडल के लिए तैयार किए अध्यक्षीय भाषण में जिसे एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था उसके पहले ही पन्ने पर एक स्कोटिश दार्शनिक और कवि की पंक्तियों का उल्लेख किया थाजो तर्क नहीं करेगा वो धर्मान्ध है, जो तर्क नहीं कर सकता वो मूर्ख है और जिसमें तर्क करने का साहस नहीं है वह दास है।IMG_0542

अनिल चमड़िया ने कहा कि उत्पीड़न घटना नहीं, बल्कि एक विचारधारा है। हम उत्पीड़न की जब हम बात करते हैं तो हम घटनाओं की बातकरते है तो उसकी जड़की और विमर्श की बात नहीं करते। हमेशा उत्पीड़न की अनेक घटनाओं का जिक्र करके उत्पीड़न की गाथा का वर्णन करते हैं।  उत्पीड़न की घटनाएं क्यों होती है उसके क्या कारणों और उसके कारणों की गहराई तक जाना चाहिए और इन उत्पीड़न के कारणों को दूर करने के जो रास्ते हमने निकाले थे वो क्यों विफल हुए इसकी तह तक हमें जाना चाहिए और मंथन करना चाहिए।

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ड़ा. भीमराव अंबेडकर की समग्र विचारधारा को एक बिन्दू या एक शब्द में कहे तो वो क्या चाहते थेवो समतामूलक समाज का निर्माण करना चाहते थे। दूसरी तरफ उनके समकालीन बाल गंगाधर तिलक भी एक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं जिनका मानना था कि जो स्त्री और अछूत के लिए शिक्षा राष्ट्र हित में नहीं है। यह वह दौर था जिसमें धर्म और राष्ट्र को परिभाषित किया जा रहा था उसकी व्याख्या की जा रही थी। ठीक इसी समय जोतिबा फुले और अंबेडकर जैसे जनबुद्धिजीवी अछूतों और स्त्रियों की शिक्षा के लिए ढांचे बना रहे थे। जोतिबा फुले और सावित्री बाई फुले स्कूल खोल रहे थे और दलितों स्त्रियों की शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे।

दलित उत्पीड़न का इतिहास बहुत पुराना है और लम्बे समय से उत्पीड़न हो रहा है पर आज के दौर में जो उत्पीड़न हो रहा है उसमें उत्पीड़न भी हो रहा है और उत्पीड़क गर्व भी किया जा रहा है। अर्थात मारा भी जाएगा और रोने भी नहीं दिया जाएगा। आज का उत्पीड़न राजनीतिक हमला है।यदि इस दृष्टि से नहीं देखेंगें तो इसको तो समझ पाएंगें और ही इसके बारे में एक नजरिया नहीं बन पाएगा। जैसे रोहित वेमुला की हत्या कैसे हुई उसे समझना होगा। रोहित वेमुला समाज को बदलने और सामाजिकसंस्थाओं में गैरबराबरी की स्थिति को खत्म करने के लिए संघर्ष कर रहा था।

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पीट पीट कर मारने की घटनाओँ की ओर संकेत करते हुए इसे सामाजिक न्याय की शक्तियों के खतरा बताया और १५ साल पहले हरियाणा के दुलीना पुलिस चौंकी से निकाल कर दलितों को मारे जाने की घटना का जिक्र करते हुए वर्तमान समय में इसके उभार के सामाजिकआर्थिक कारणों की ओर संकेत किया। उन्होंने कहा कि इसके कारण हमारे ढांचे में हैं उसे समझने की आवश्यकता है। डा. आंबेडकर और जोतिबा फुले का संघर्ष पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ था। आज इनका विकराल रूप सामने रहा है। न्याय की पक्षधर शक्तियों को संघर्ष करने के लिए एकजुट होने की आवश्यकता है।

इस परिचर्चा में प्रेम सिंह, विजय विद्यार्थी, डा. कृष्ण कुमार, राजविंद्र चंदी, रितू, सुमन ने भाग लिया। इसका संचालन अश्विनी दहिया ने किया और अध्यक्षता ओमप्रकाश करुणेश प्रोफेसर सुभाष चंद्र ने की।

नयी सुबह तक

कुरुक्षेत्र, 10 मार्च
देस हरियाणा द्वारा स्थानीय महात्मा ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय में देश की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शिव रमन गौड के काव्य-संग्रह नयी सुबह तक पर समीक्षा गोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में शिव रमन गौड ने अपने काव्य-संग्रह की कविताओं का पाठ किया।
संगोष्ठी का शुभारंभ महात्मा ज्योतिबा फुले एवं सावित्रीबाई फुले की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने के साथ हुआ। सैनी समाज सभा के प्रधान गुरनाम सिंह ने आए अतिथियों का स्वागत किया। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के प्रोफेसर एवं देस हरियाणा के संपादक डॉ सुभाष सैनी ने सावित्रीबाई फुले को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी कविता एवं अपने महात्मा ज्योतिबा फुले को लिखे दो पत्र पढ कर सुनाए। उन्होंने कहा कि देश की पहली शिक्षिका एवं समाज सुधारक होने के साथ-साथ सावित्री फुले एक कवयित्री और लेखिका भी थी और उनकी कविताओं में अपने समय के सवाल मुखर रूप से उजागर होते हैं। उन्होंने कहा कि सावित्री फुले से प्रेरणा लेते हुए आज के साहित्यकारों को अपने समय की विसंगतियों, बुराईयों, अंधविश्वासों का विरोध करते हुए समाज की बेहतरी का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। 
शिव रमन ने कहा कि समाज में कच्चापन, थोथापन एवं खालीपन आ गया है। ऐसे समय में उनके काव्य संग्रह की कविताएं संवेदनहीनता, मानवमूल्यों के ह्रास, कृत्रिम जीवन की ओर संकेत करती हैं। उन्होंने कहा कि समाज के सबसे कमजोर लोगों के पक्ष में नयी सुबह तक प्रयास होने चाहिएं, यही उनकी कविताओं का मूलभाव है। उन्होंने कहा कि काव्य-संग्रह की कविताएं तीन भागों-नयी सुबह, नीलकंठ और तेरी खुश्बू में बंटी हुई हैं। 
  
साहित्यकार एवं समीक्षक माधव कौशिक ने काव्य-संग्रह पर समीक्षात्मक विचार रखते हुए कहा कि यह संग्रह संश्लिष्ट कथ्य की कसावट तथा सहज शिल्प की बुनावट की वजह से उनके पिछले दो काव्य-संग्रहों से अधिक प्रभावपूर्ण तथा विचारोत्तेजक है। इन कविताओं की पृष्ठभूमि में रचनाकार का जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण सतत प्रवाहमान रहा है। उपभोक्तावादी अपसंस्कृति की आंधी में लुप्त होते जीवन-मूल्यों का बिखराव कवि को निरंतर आंदोलित और उद्वेलित करता है। 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से सेवाानिवृत्त प्रोफेसर दिनेश दधीचि ने विश्व साहित्य के विभिन्न संदर्भों का जिक्र करते हुए शिव रमन के काव्य-संग्रह के कथ्य और शिल्प पर बेबाक चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्तमान धर्मोन्माद, घृणा, नफरत के माहौल में साहित्यकारों के सामने सच और सद्भाव के पक्ष में खडे होना है और शिव रमन ने यह कार्य किया है। उन्होंने कहा कि काव्य-संग्रह की कविताएं मुक्त छंद होते हुए भी छंद के गुणों से युक्त हैं। विभिन्न कविताओं की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि पंक्तियों में उर्दू गजल का अनुशासन देखने को मिलता है। 
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी आरआर फुलिया ने शिव रमन को उनके काव्य-संग्रह को लेकर बधाई देते हुए कहा कि आज समाज में अध्ययन एवं विचार-विमर्श की संस्कृति को बढावा देने की जरूरत है। देस हरियाणा के द्वारा यह काम पूरी शिद्दत से किया जा रहा है। 
हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक पूर्णमल गौड ने कहा कि एक रचनाकार का दायित्व है कि वह अपने समय की सच्चाईयों को उद्घाटित करे। सावित्रीबाई फुले ने यह काम किया और वे आज के साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने अकादमी की तरफ से सावित्री फुले के साहित्य का संग्रह प्रकाशित करवाने का आश्वासन दिया। कपिल भारद्वाज, राजेश कासनिया, चंडीगढ डीएवी स्कूल की प्रिंसिपल विभा ने भी काव्य-संग्रह पर अपने विचार व्यक्त किए।
देस हरियाणा से जुडे सुनील थुआ ने आए अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर राम कुमार आत्रेय, अरुण कैहरबा, कुमार विनोद, विपुला, राज कुमार जांगडा, विकास साल्याण, हरपाल शर्मा, ओमप्रकाश करुणेश, विजय विद्यार्थी, मनोज कुमार, डॉ कृष्ण कुमार, ब्रह्मानंद, रजविन्द्र चंदी, राजीव सान्याल सहित अनेक साहित्यकार मौजूद रहे।      

हरियाणा सृजन उत्सव 2019, कार्यक्रम

तीसरे हरियाणा सृजन उत्सव  का आगाज हो चुका है। हर वर्ष यह कार्यक्रम फरवरी के महीने में कुरूक्षेत्र में आयोजित किया जाता है। यह एक साहित्यिक-सांस्कृतिक और समाजिक गतिविधियों का कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का आयोजन देस हरियाणा पत्रिका  की तरफ से किया जाता है। सृजन उत्सव हरियाणा में होने वाला साहित्यिक महाकुम्भ माना जाता है। इसकी शुरूआत वर्ष 2016 में हुई थी तब इस कार्यक्रम में जाने माने नाटककार असगर वजाहत ने शिरकत की थी। इनके अलावा फ़िल्म अभिनेता यशपाल शर्मा, कहानीकार ज्ञानप्रकाश विवेक, बजरंग बिहारी तिवारी, विकास नारायण राय, अभय मोर्य, अनिल चमड़िया, आदि जाने माने सामाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्यकारों ने भाग लिया था। पिछले वर्ष दूसरे हरियाणा सृजन उत्सव का सफल आयोजन किया गया। इसका उदघाटन पंजाबी के सुप्रसिद्ध कवि और पंजाब कला परिषद के अध्यक्ष सुरजीत पात्तर ने किया और समापन राज्य सभा टी.वी के पुर्व चीफ एडिटर उर्मिलेश उर्मिल ने किया था।

 

हरियाणा सृजन उत्सव – 2019

इस वर्ष सृजन उत्सव का आयोजन 9-10 फरवरी को कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के आर.के.सदन में किया जाएगा । अबकी बार इस कार्यक्रम का उदघाटन बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के रिटायर प्रोफेसर चोथी राम यादव जी करेंगे और सृजन की परंपराएः संघर्ष और द्वंद्व विषय पर अपना वक्तव्य पेश करेंगे। कार्यक्रम में दूसरे सत्र का संयोजन युवा लेखक अमित मनोज करेंगे। इसका विषय होगा युवा सृजनः संवेदना, संकल्प और संकट । इसमें देशभर से विभिन्न युवा लेखक भाग लेंगे। तीसरा सत्र लेखक से मिलिए में  एस.आर. हरनोट अपनी रचनायात्रा को प्रस्तुत करेंगे।

हरियाणा सृजन उत्सव 2017

 

बहुभाषीय कवि सम्मेलन

कार्यक्रम में इस विभिन्न प्रांतीय भाषाओं का कवि सम्मेलन भी करवाया जाएगा। इसमें हरियाणवी, पंजाबी,हिन्दी, राजस्थानी, और पहाडी भाषा के विभिन्न कवि भाग लेंगे इनमें रामस्वरूप किसान (राजस्थानी), नीतू अरोड़ा (पंजाबी),  रिसाल जांगड़ा (हरियाणवी), प्रोफेसर राजेंद्र गौतम, हरेराम समीप, आत्मारंजन आदि कवि शामिल होंगे।

सांस्कृतिक गतिविधि –

उत्सव के पहले दिन की संध्या में एक नाटक खेला जाएगा जिसका नाम है ‘हम देर नहीं करते देर हो जाती है’ नाटक के निर्देशक है कृष्ण कुमार। यह नाटक प्रख्यात साहित्यकार कृष्ण कुमार ‘भिखु’ की रचना ‘जामुन के पेड़’ पर आधारित है। नाटक के पश्चात प्रख्यात रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज के साथ रंगकर्म पर चर्चा की जाएगी।

दूसरे दिन सृजन उत्सव में पहले सत्र में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा जिसका विषयः हरियाणा की साहित्यिक परंपरा – अल्ताफ हुसैन हाली पानीपती और बालमुकुंद गुप्त को केन्द्र में रखते हुए परिचर्चा की जाएगी। इस संगोष्टी में भागीदारी लेंगे सत्यवीर नाहड़िया, एम. पी. चांद, डा. कृष्ण कुमार, रोहतास । इसमे इसके साथ शोधार्थी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत करेंगे। इसका संगोष्ठी का संयोजन और संचालन डा. कृष्ण कुमार करेंगे ।

कार्यक्रम में रंगमंच और सिनेमा पर्दे के प्रसिद्ध अभिनेता यशपाल शर्मा अपने पसंदीदा तीन नाटको की के बारे में चर्चा करेंगे।

हरियाणवी मनोरंजन के क्षेत्र में सक्रिय सृजकों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम में एक खुली बहस का आयोजन किया जाएगा। जिसमें विभिन्न विषयों को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित भागीदार जिनमे होंगे इनमें विक्रम दिल्लोवाल, दीपक राविश, इकबाल सिंह, मोनिका भारद्वाज, रोशन वर्मा आदि शामिल होंगे। इस सत्र की अध्यक्षता हरविंद्र मलिक (डायरेक्टर एंडी हरियाणा), कमलेश भारतीय, (वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार)  सुमेल सिंह सिद्धू, (इतिहासकार व निदेशक इदारा 23 मार्च)  करेंगे । इस सत्र का संचालन धर्मवीर करेंगे ।

समापन भाषण –

हरियाणा सृजन उत्सव 2019 का समापन भाषण  अहा जिन्दगी’  पत्रिका के पुर्व संपादक और संवाद प्रकाशन के निर्देशक आलोक श्रीवास्तव करेंगे। इनके वक्तव्य का विषय होगा – वर्तमान दौर की चुनौतिया और सृजन। इस सत्र का संचालन करेंगे अविनाश सैनी ।

 सृजन उत्सव को लेकर टिप्पणिया –

विभास वर्मा–  मैं दिल्ली में बहुत सारे कार्यक्रमों में गया हूं लेकिन यहां पर आने का मेरा अनुभव कुछ अलग हैं। यहां आकर आस्था बढ़ती है, हिम्मत मिलती है।

पल्लव– मैंने पिछले 10-12सालों में ऐसा बढ़िया आयोजन जनता के सहयोग से जनता के द्वारा नहीं देखा। यह कहते हुए मैं बहुत खुश हो रहा हूं। ‘हरियाणा सृजन उत्सव’ और ‘देस हरियाणा’ की पूरी टीम के संकल्प को नमन करता हूं। यह आप जबरदस्त काम कर रहे हैं।

 

सुरजीत पातर

हरियाणा सृजन उत्सव जैसा ऊर्जाभरा कार्यक्रम मैने अपने क्षेत्र में नहीं देखा। मैं यहां से बहुत कुछ लेकर जा रहा हूं। हम भी पंजाब में ऐसा कार्यक्रम करने की कोशिश करेंगे।

ज्ञान प्रकाश विवेक – ऐसा कहा जा सकता है कि यह समाज उत्पाद करता है। केवल प्रोडक्टिव है यह समाज । प्रोडक्टिव समाद में सृजन असंभव है – इस ‘मिथ’को आज के सृजन उत्सव ने गलत साबित किया है। हरियाणा में मैने अपने लेखन चालीस वर्षों में पहली बार देखा.. और महसुस किया है। यहाँ साहित्य का अदब था।

अनिल चमडिया – हरियाणा में इस तरह के कार्यक्रम को करना मेरे लिए सुखद आश्चर्य की बात है। बेहद प्रसन्नता की बात है और मैं समझता हूं कि आप हरियाणा में एक नई शुरूआत करने जा रहे हैं।

यहां सांस्कृतिक गतिविधियों की कमी थी। वो सांस्कृतिक गतिविधियां जो आपकी सांस्कृतिक ऊर्जा को एक बड़े सृजन में बदल जाए, यह कार्यक्रम वह करने जा रहा है।

असगर वजाहत – सरकारी सहायता के बिना पूरी स्वतंत्रता के साथ संस्कृति का निर्माण हो और एक सांस्कृतिक आंदोलन बने जो अपने ही पैरों पर खड़ा हो। हरियाणा के पचासवें साल में पहला सृजन उत्सव बिना किसी सरकारी सहायता और बिना किसी आडम्बर के संपन्न हुआ है

प्रदीप मानव – हरियाणा जैसे सांस्कृतिक उठापटक से जूझ रहे समाज के लिए यह कार्यक्रम मील का पत्थर साबित होगा। बहुत से लोग इस कार्यक्रम को एक मंच के तौर पर देख रहे हैं जहां उन्हें अपनी अभिव्यक्ति के सम्मान की जगह नजर आती है। मेरी जानकारी में अपनी तरह का इतना विविधता भरा पहला आयोजन रहा है।

टी. आर. कुंडू – आज एक ऐतिहासिक दिवस है हम एक नए अध्याय की शुरूआत करने जा रहे हैं हरियाणा सृजन उत्सव के साथ। हरियाणवी भाषा में कहते हैं कि ‘कहलवा तो गांम रहा है और कह मैं रहा हूं।’ यानी इस काम की कमी तो सबको महसूस हो रही थी, लेकिन इन्होंने इसको कर दिखाया है, उसके लिए बधाई के पात्र हैं।