नई रागनी के शिखर पुरुष पं. जगन्नाथ से संवाद

रोशन वर्मा 

नई रागनी के शिखर पुरुष पं. जगन्नाथ हमारे बीच नहीं रहे। देस हरियाणा की ओर से कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि। रचनाकार के स्वयं के बारे में जानना भी एक अनूठा अनुभव होता है। पं. जगन्नाथ जी के अवदान को याद करते हुए प्रस्तुत है  2013 में  रोशन वर्मा की पंडित जगन्नाथ से हुआ संवाद

हरियाणा प्रदेश के लोक संगीत एवं लोक साहित्य के संदर्भ में अतीत एवं वर्तमान दोनों का समग्रता से अवलोकन करें तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक नाम मानस पर बार-बार दस्तक देता जाता है, और वो नाम है पंडित जगन्नाथ भारद्वाज समचाना का । उनकी रचनाओं एवं गायन में प्रथम दृष्टि देखने भर से ही प्रदेश की लोक संस्कृति के सरोकार अपनी संपूर्णता के साथ विद्यमान नजर आते हैं । उनकी रचनाओं में जीवन दर्शन के विराट बिम्ब अपनी प्रभावपूर्ण छंद एवं शैली के साथ उपस्थित हैं। उनकी रचनाएं सामाजिक सरोकार भी निभाती हैं और मानवीय भूलों एवं कुरीतियों से बचे रहने को आगाह भी करती हैं । हरियाणा साहित्य अकादमी से ‘‘विशिष्ट साहित्य सेवा’ सम्मान से पुरस्कृत हैं।

रोशन वर्माः अपने जन्मदिन, जन्म स्थान, कर्म भूमि एवं बचपन के बारे में कुछ बताएं ?
पं जगन्नाथ: मेरा जन्म 24 जुलाई सन् 1939 को गांव समचाना, जिला रोहतक हरियाणा में हुआ । यह तीजों के त्योहार का दिन था । जिस समय तीज मनाई जा रही थी, औरतें पींघ झूल रही थी और गीत गा रही थी । एक तरह से जब मैंने इस धरा पर अपने नन्हे कदम रखे तो प्रकृति का पूरा वातावरण संगीतमय था । अतः यही कारण है कि मेरा संगीत से लगाव बचपन से ही है।

रोशन वर्माः शिक्षा के समय की कुछ यादें, उस समय शिक्षा का परिदृश्य क्या था ?
पं जगन्नाथ: प्रथम शिक्षा तो मुझे अपने घर से ही प्राप्त हुई । क्योंकि हमारे पूर्वज सभी विद्वान पंडित थे । संस्कृत की विद्या मुझे घर से प्राप्त हुई । उनके पास रहने, उनके सानिध्य मात्र से ही संस्कृत भाषा का काफी अनुभव हो चुका था। केवल चार साल की उम्र में मैंने, अपने पिताश्री की अनुपस्थिति में एक शादी समारोह में फेरे करवा दिये थे । उस समय स्कूली शिक्षा में मेरी रूचि नहीं थी, क्योंकि हमारे ही घर में पाठशाला थी और हमारे दादा जी विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे।

रोशन वर्माः आप अपने प्रारम्भिक रचना कर्म में प्रवृत होने के लिये किन बातों, परिस्थितियों या व्यक्तियों को श्रेय देना चाहेंगे?
पं जगन्नाथ: छह साल की उम्र में परिजनों ने मुझे गांव के ही प्राथमिक स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु भेजा, जिस प्रथम गुरू ने मेरा नाम रजिस्टर में लिखा था, वो हमारे ही गांव के पंडित रामभगत जी थे । मैं उनको ही अपना सत्गुरू मान कर उनके चरणों में रहने लगा । जब स्कूल में शनिवार के दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम होता तो गुरू जी मुझे एक भजन सुनाने का अवसर जरूर देते । एक दिन उस समय के सिंचाई मंत्री चौ. रणबीर सिंह, जो कि स्वतन्त्रता सेनानी भी थे, वह हमारे स्कूल में आए । उनके आगमन पर मैंने एक स्वागत् गान खुद ही बनाया और सुना दिया । उस दिन के बाद सदैव गुरू जी ने मुझे उत्साहित किया, बस यहीं से लिखने का क्रम शुरू ।

रोशन वर्माः शुरूआती समय में किन की रागनियों एवं लोक नाट्यों ने आपको ज्यादा प्रभावित किया ?
पं जगन्नाथ: मैं पंडित लखमी चंद की कविताई से ही ज्यादा प्रभावित हुआ हूं । मैंने अपनी कविता कम गाई, परन्तु पंडित लखमी चन्द जी के बनाए हुए सभी सांग, भजनों को तरीके एवं मर्यादा से घड़वे-बैंजों पर गाया है ।

रोशन वर्माः पहली रचना किस उम्र में और कौन सी लिखी, कुछ बताएं ?
पं. जगन्नाथः पहली रचना तो चौ. रणबीर सिंह, सिंचाई मंत्री, पंजाब के स्वागत् में लिखी व गाई थी । वह अब तक याद रखना संभव नहीं है ।

रोशन वर्माः आप रागनी एवं कम्पीटीशन की तरफ कैसे प्रवृत हुए ?
पं जगन्नाथ: मैं कभी भी रागनियों की तरफ प्रवृत नहीं हुआ और न ही कभी किसी प्रतियोगिता में भाग लिया । मैंने तो सभी धर्मिक एवं ऐतिहासिक रचनाओं का सृजन व गायन किया है ।

रोशन वर्माः वर्तमान समय में जो लोग रागनी लिख रहे हैं, गा रहे हैं, उनके काम से क्या आप संतुष्ट है ?
पं जगन्नाथ: आज के समय में जो भी लिखा जा रहा है, अगर उसमें फूहड़ता ;अश्लीलता नहीं है तो, मैं सभी लिखने वालों को बधाई देता हूं ।

रोशन वर्माः कितने किस्से एंव रागनियां आप द्वारा रचित हैं ?
पं जगन्नाथ: पूरा शब्द कर्म संभालना मुश्किल है, जो बचपन में लिखा-वह जवानी में गुम हो गया और जो जवानी में लिखा वो बुढ़ापे में गुम हो गया । वैसे इस समय मेरे पास स्वरचित करीब सोलह इतिहास व आठ सौ भजन, उपदेश हाजिर हैं ।

रोशन वर्माः भविष्य में आप अपनी किस योजना को प्रारूप देने की इच्छा मन में रखते हैं ?
पं जगन्नाथ: कृपया माफ करना, मैं भविष्य के बारे में कभी नहीं सोचता और न ही कोई अग्रिम योजना बनाता हूं । मेरा तो हर समय वर्तमान में ही रहने का स्वभाव है ।

रोशन वर्माः वर्तमान परिदृश्य में रागनी का भविष्य क्या देखते हैं आप ?
पं जगन्नाथ: वर्तमान परिदृश्य में हरियाणवी संगीत काफी उन्नति पर है । जिसको आप बार-बार रागनी नाम से सम्बोध्ति कर रहे हैं-वह रागनी नहीं है, यह केवल हरियाणवी संगीत है, जिसको पहले समय में अश्लील समझते थे, वही किस्से वही कविता, जिसको आज सब सुनना पसन्द करते हैं ।

रोशन वर्माः आम धरणा है कि अस्सी के दशक में घड़ा-बैजों को आपने वाद्य के रूप में स्थापित कर पहचान दिलाई, क्या यह सच है ?
पं जगन्नाथ: घड़ा-बैंजू तो मेरे जन्म से पहले भी प्रचलन में थे, परन्तु इनका प्रयोग करने वालों को अश्लील समझा जाता था । क्योंकि ज्यादातर आवारा किस्म के लोग खेतों में कोल्हूवों में इन्हें बजाया करते थे, गांव बस्ती में इस साज़ को बजाने की मनाही होती थी । मैंने सन् 1970 में घड़ा-बैंजू को अपनाया और काफी विरोध के बावजूद भी मैंने इस साज़ को नहीं छोड़ा । कुछ नये प्रयोग और धार्मिक, ऐतिहासिक रचनाओं का इन वाद्यों के साथ तालमेल, इनकी जन स्वीकृति का कारण बना और आहिस्ता-आहिस्ता सारे समाज ने ही इस साज को स्वीकार कर लिया, यहां तक कि आकाशवाणी दिल्ली व दिल्ली दूरदर्शन पर हरियाणा की तरफ से मैंने घड़े-बैंजू पर सबसे पहले गाना गाया, जिसे दूरदर्शन ने भी सहर्ष स्वीकार किया । बार-बार मेरे कार्यक्रम दिल्ली दूरदर्शन से घड़े-बैंजू पर आते रहे, फिर जनता ने भी स्वीकार कर लिये ।

रोशन वर्माः आपकी स्वयं की आवाज में कृष्ण सुदामा के किस्से को हमने बचपन में एक-एक दिन में कईं कईं बार सुना है, और कौन-कौन से किस्से ज्यादा चर्चित रहे हैं ?
पं जगन्नाथ: मैंने अपने किस्से बहुत कम गाये हैं, ज्यादातर पंडित लखमीचंद जी के किस्से गाये हैं-जो सभी चर्चित रहे हैं।

रोशन वर्माः कुछ हरियाणावी फिल्मों में रागनी एवं आप द्वारा स्थापित वाद्य का प्रयोग हुआ है । ‘‘पिगंला भरथरी’’, ‘‘मुकलावा’’,‘‘यारी’’,‘‘लाडो’’ इसके उदाहरण है । इस बारे कुछ कहें ?
पं जगन्नाथ: जब आकाशवाणी और दूरदर्शन ने यह साज स्वीकार कर लिया तो फिल्म वालों को क्या आपत्ति हो सकती थी, उनको तो दिखाने के लिये कुछ नई चीज मिल गई ।

रोशन वर्माः रागनी कम्पीटीशन के लिये एक समय पूरे हरियाणा में लहर थी । आज प्रदेश के कौन-कौन से क्षेत्र विशेष को सक्रिय का दर्जा देना चाहेंगे ?
पं जगन्नाथ: जिसको हम और आप कम्पीटीशन का नाम दे रहे हैं, दरअसल यह कम्पीटीशन नहीं है, यह केवल एक कार्यक्रम हैं । वहां कोई मुकाबला नहीं होता, न ही किसी की हार-जीत होती है । सभी बराबर का ईनाम लेते हैं । यह खेल या कार्यक्रम ज्यादा दिन तक चलने वाला नहीं है । कुछ ही दिनों बाद और कुछ नया आ जायेगा, क्योंकि … समय परिवर्तनशील है ।

रोशन वर्माः क्या पंडित लखमीचंद जी को सुनने या देखने का अवसर आपको मिल पाया ?
पं जगन्नाथ: पंडित लखमीचंद जी को देखने या सुनने का अवसर नहीं मिला, क्योंकि कुछ तो छोटी उम्र थी और हमार परिजनों की भी कुछ पाबंदिया थी जो हमें सांग आदि देखने से रोकती थी ।

रोशन वर्माः हरियाणा सरकार ने आपको कुल कितनी बार सम्मानित किया है एवं सरकार के अलावा मिले अन्य सम्मानों के बारे में कुछ बताएं ?
पं जगन्नाथ: हरियाणा सरकार ने अनेक बार सम्मानित किया है । चौ. भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सहित पूर्व मुख्यमंत्रियों, चौ. बंशीलाल, चौ. देवीलाल, चौ. ओमप्रकाश चौटाला के कार्यकाल में एंव श्री बलराम जाखड़, चौ अजय चौटाला, श्री दीपेन्द्र हुड्डा के कर कमलों से भी मुझे सम्मानित होने का अवसर मिला है । एशियाड 82 के समय एक एल. आई.जी. फलैट अशोक विहार दिल्ली में, मेरे कार्यस्थल डी.डी.ए. ने सम्मान स्वरूप दिया । श्री साहब वर्मा, तत्कालीन मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार ने अपने कार्यकाल में दिल्ली सरकार की तरफ से तीन बार सम्मानित किया । श्री गुलाब सिंह सहरावत, उपायुक्त रोहतक ने एक किलो सौ ग्राम चांदी के डोगे से सम्मानित किया । गांव धराडू, भिवानी की पंचायत ने सोने का तमगा दे कर सम्मानित किया । गांव बापौड़ा, भिवानी की पंचायत ने 5100 रूपये व सोने की अंगूठी से दो बार सम्मानित किया । इसके अतिरिक्त भी असंख्य बार सम्मान मिले हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि मुझे अपने चाहने वालों और संगीत के कार्यक्रमों से बहुत सम्मान व स्नेह मिला है । अक्सर जहां भी किसी संगीत के कार्यक्रम में मैं उपस्थित हूं तो – पहले मेरा सम्मान करते हैं, उसके बाद कार्यक्रम शुरू करते हैं ।

रोशन वर्माः वैसे तो हर कवि एवं रचनाकार के लिए अपनी प्रत्येक रचना संतान-तुल्य होती है । फिर भी किसी एक रचना का जिक्र करें, जिसका लोगों के अनुरोध् पर बार-बार गायन करना पड़ा हो ?
पं जगन्नाथ: जब पंडित जवाहरलाल नेहरू का स्वर्गवास हुआ तो उनकी शवयात्रा में शामिल होने का अवसर मुझे भी मिला । वहां जो कुछ मैंने अपनी आंखों से देखा, उसको कविता का रूप दे दिया और जहां पर भी वह कविता एक बार सुनाई, वहां बार-बार उसकी फरमाइश आती रहती थी ।

रोशन वर्माः भारतीय समाज इस वक्त मंहगाई समेत कईं मोर्चों पर संकट झेल रहा है । एक सामान्य नागरिक के हालात के बारे में आप क्या महसूस करते हैं ?
पं जगन्नाथः मंहगाई एवं समसामयिक विषयों पर मेरी टिप्पणी महत्वपूर्ण नहीं है ।

रोशन वर्माः हरियाणा के लोकसाहित्य एवं लोकनाट्य के सन्दर्भ में आपको समकालीन कवि सूर्य पंडित जगन्नाथ के नाम से पुकारा जाये, तो क्या आप सहमत हैं ?
पं जगन्नाथ: मुझे मालिक ने, मेरी योग्यता से भी अधिक दे रखा है । मुझे और कुछ भी पाने की इच्छा नहीं हैं। परमात्मा खुश होकर जो कुछ देते हैं-उसको खुशी से स्वीकार करता हूं । मैं अपने आपको समकालिन कविसूर्य कहलाने के योग्य नहीं समझता हूं ।

रोशन वर्माः जैसा कि प. जगन्नाथ रचनावली का प्रकाशन हो चुका है । आपके सृजन कार्य पर शोध भी हो रहे हैं । क्या आपको मानदेय एवं रायल्टी भी प्राप्त हो रही है ?
पं जगन्नाथ: मेरी लिखी पुस्तक प. जगन्नाथ रचनावली का जब विमोचन हुआ तो उस समय महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय ने 11000 रूपये से सम्मानित किया था। इसके बाद उस पुस्तक पर मेरा कोई अधिकार नहीं । मैं रायल्टी वगैरह कुछ नहीं लेता ।

रोशन वर्मा: हरियाणवी रागनी या कविता के रचनाकर्म में किन छंदों एवं नियमों की पालना का होना जरूरी है ? नए लोगों को कोई सलाह ?
पं जगन्नाथ: इस प्रश्न का उत्तर इतने कम समय में नहीं समझाया जा सकता, यहां यह बात भी महत्वपूर्ण है, सृजन की प्रक्रिया में आत्मिक अनुभव का होना बहुत जरूरी है ।

रोशन वर्माः आज के युवा जाति से बाहर जा कर शादी कर रहे हैं । पारिवारिक एवं सामाजिक ताना बाना बिखराव की ओर हैं । आपका कविमन क्या कहता है इस बारे में ?
पं जगन्नाथ: मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में रूचि नहीं रखता, क्योंकि यह किसी के वश की बात नहीं रह गई है, यह संसार है ही परिवर्तनशील ।

रोशन वर्माः किसी भी सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण, एक लोक कलाकार के लिये मंच से दृष्टीगत जन समूह होता है या मंच पर मिला सम्मान ?
पं जगन्नाथ: मैंने मंच के माध्यम से पैसा कमाने को, कभी अपना उद्देश्य नहीं बनाया-केवल जनता का प्यार, मान सम्मान व वाह-वाही ही मेरी असल कमाई है ।

रोशन वर्माः पिछले दिनों हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये सम्मान से बेशक आप संतुष्टी जाहिर करेंगे । मगर आपकी रचनाओं के मुल्यांकन एवं वरिष्ठता के लिहाज से, क्या यह सही सम्मान है ?
पं जगन्नाथ: मेरे मन में किसी के प्रति न तो कोई शिकायत है और न ही किसी से कोई मांग है । मुझे जो कुछ भी सम्मान में मिला व हरियाणा साहित्य अकादमी ने जो मेरा सम्मान किया, मैं उस से पूर्ण रूप से संतुष्ट हूं , सम्मान तो केवल सम्मान है । यह कभी छोटा या बड़ा नहीं हो सकता ।

रोशन वर्माः अकादमी की पुरस्कार वितरण एवं चयन प्रकिया में अनियमितताओं बारे कुछ वरिष्ठ लेखकों ने विरोध दर्ज करवाया, कि कुछ कम उम्र लोग जिनका न तो मुद्रित साहित्य उपलब्ध है और न ही राज्य की जनता उनसे/उनके काम से परिचित है, को ज्यादा वरिष्ठ सम्मान दिये गये, और वरिष्ठ लोगों का आकलन कम हुआ है । इस बारे आप क्या कहना चाहेंगे ?
पं जगन्नाथ: इस प्रश्न का उत्तर, आपके पिछले प्रश्न के अंतर्गत दे दिया गया है ।

रोशन वर्माः राजकिशन अगवानपुरिया ने आप द्वारा रंचित रागनियों एवं किस्सों को बड़ी खुबसुरती से स्वर दिया है अन्य किस गायक के काम ने आपको प्रभावित किया ?
पं जगन्नाथ: मेरे जितने भी शिष्य है, मैं सब को ही राजकिशन के समान समझता हूं ।

रोशन वर्माः राजकिशन से जुड़ी कोई घटना बताइये । वे कब आप के सानिध्य में आये ?
पं जगन्नाथः इस प्रश्न का उत्तर, देने में भी मैं अपने आपको असमर्थ समझता हूँ ।
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मानव मूल्यों के अपसरण को अपने इस शब्द कर्म में उन्होंने करीब चार दशक पहले ही महसूस करा दिया था जो वर्तमान परिदृश्य में भी प्रासंगिक है…

बेशर्मी छाग्यी सारे कै, बिगड़या सबका दीन
आज मैं किस पै, करूं रै यकिन…

झुठे तेरे बाट तराजू झुठी खोल्यी तनै दुकान
झुठा सौदा बेचण लाग्या, नहीं असल का नाम निशान
झुठा बोल्लै कमती तोल्लै, आये गयां के काटै कान
झुठा लेखा जोखा देख्या, झुठी देख्यी तेरी बही
झुठे तू पकवान बणावै, झुठे बेच्चै दुध् दही
झुठा लेवा झुठा देवा, और बता के कसर रही
खान पान पहरान बदलगे बुद्धि हुई मलीन…

झुठी यारी, यार भी झुठे, झुठा करते कार व्यवहार
झुठे रिश्ते नाते रहग्ये, लोग दिखावा रहग्या प्यार
बीर मर्द का, मर्द बीर नै, कोए से नै ना ऐतबार
माया के नशे म्हं चूर फिरते हैं अभिमानी बोहत
बुगले आला दां राख्खैं सै, इसे देख्ये ज्ञानी बोहत
लेण देण नै कुछ ना धोरै, इसे देख्ये दानी बोहत
बड़े-बड़या ने मोह ले यैं तिन्नूं जर जोरू और जमीन…

दीखणे म्हं धर्म धारी, काम है चंडाल का
सिंह रूपी वस्त्र धारे, काम नहीं शाल का
पाखण्ड का सहारा लिया, हुकम कल्लु काल का
पलटया है जमाना, होया धर्म कर्म का बिल्कुल अंत
बीज तै बदल गये, कयाहें म्हं ना रहया तंत
वेद-पाठी पंडत कोन्या, टोहे तै ना मिलते संत
कायर-छत्री, निर्धन-बणिया, ब्राहमण विद्या हीन…

सत् पुरूषां की मर होग्यी, यो किसा जमाना आग्या रै
वेद व्यास जी कहया करैं थे, वो हे रकाना आग्या रै
गुरू रामभगत की कृपा तै, मन्नैं कुछ कुछ गाणा आग्या रै
बालकपण म्हं मौज उड़ाई, खाये खेल्ले बोहत घणे
गाया और बजाया, देख्खे मेले ठेले बोहत घणे
झुठे यार भतेरे देख्खे, झुठे चेल्ले बोहत घणे
जगन्नाथ यों सच्चे चेल्ले, हों सै दो या तीन…

(रोशन वर्मा ने ये संवाद देस हरियाणा पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजा था, लेकिन अभी तक हम इसे प्रकाशित नहीं कर पाए थे। आभार- हरियाणाखास का कि उन्होंने प्रकाशित किया और हमें इस अवसर पर ये सामग्री उपलब्ध रही)

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हरियाणा में सांग परम्परा – सपना रानी

आलेख


हरियाणा में लोक मंच को ‘सांग’ के नाम से जाना जाता है। ‘सांग’ शब्द,  स्वांग शब्द से बना है जो नाट्य शास्त्र के ‘रूपक’ शब्द का पर्याय है।  सांग हरियाणा की संस्कृति के जीवन का दर्पण है यहां के निवासियों के सामाजिक और नैतिक मूल्य, लोक जीवन से जुड़ी वीरता और प्रेम की कहानियां, खेत-खलिहान, दान-पुण्य और  अतिथि सत्कार के भाव अभिव्यक्त करता है। सांग-गीत, संगीत और नृत्य का कला-संगम हैं।

18वीं शताब्दी से पूर्व सामूहिक मनोरंजन के दो साधन थे – मुजरा और नकल। सम्पन्न परिवारों में विवाह आदि के अवसर पर ये कार्यक्रम होता था। मुजरे के लिए नृत्यांगनाएं आती थी और नकल के लिए नकलिए व नक्कालों को बुलाया जाता था जो अपने-अपने तरीकों से सामूहिक मनोरंजन किया करते थे परन्तु एक सभ्य समाज में नृत्यांगनाओं व नक्कालों को हेय की दृष्टि से देखा जाता था। ऐसी परिस्थिति में सांग का उद्भव हुआ।

हरियाणवी सांग का मंच  आडम्बरहीन व सादा होता है। किसी भी खुले स्थान पर तख्त लगाकर और उन पर दरियां बिछाकर सांग की स्टेज तैयार कर ली जाती है। इसमें न किसी पर्दे की आवश्यकता होती है और न ही नेपथ्य की। यहां पर सब कुछ खुले में दर्शकों के सामने होता है प्रवेश, प्रस्थान, संवाद, गाना और नाचना आदि सब कुछ विभिन्न पात्रों के द्वारा खुले मंच पर ही किया जाता है।

हरियाणा में सांग का आरम्भ लगभग 1730 ई. में द्वारा किया गया। किशन लाल भाट के सांगों का अधिक इतिहास तो उपलब्ध नहीं है परन्तु यह जानकारी अवश्य है कि उन्होंने सांग कला को जन-जन तक  पहुंचाया। उन्होंने नृत्य और नकल में कथानक और नाटकीय तत्वों को डालकर सांग कला को एक नई दिशा प्रदान की। इससे पूर्व पुरूष सांग नहीं करते थे अपितु वेश्याएं सांग करती थी।

किशन लाल भाट के बाद बंसीलाल नामक सांगी ने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में  अभिनय किया। उनके सांग ‘गोपीचन्द’ का विवरण प्रसिद्ध लेखक आर.सी. टेम्पल ने ‘द लिजेण्डस ऑफ द पंजाब’ में किया है। बंसीलाल के सांग कौरवी क्षेत्र अम्बाला और जगाधरी में होते थे।

19वीं शताब्दी के मध्य में (1854 से 1889 तक) अलीबख्श नामक सांगी प्रसिद्ध हुए। उनका कार्यक्षेत्र, धारूहेड़ा, रेवाड़ी, मेवात और भरतपुर थे। उन्होंने चौबोला, जिकारी, बहार, गजल और भजन के रूप में अपनी गेय रचनाएं प्रस्तुत की। उनके प्रसिद्ध सांग रहे पदमावत, कृष्ण लीला, निहालदे, चन्द्रावल और गुलब कावली। परन्तु अलीबख्श की रचनाएं तथा संगीत लोकधुनों के अभाव में पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर पाई।

19वीं शताब्दी  के अन्त में आए पं. नेतराम। आरम्भ में वे भजन-कीर्तन किया करते थे परन्तु लोगों का रूझान सांग की तरफ अधिक देखकर उन्होंने लोक भाषीय संगीत का सहारा लिया और सांग मण्डली का निर्माण किया उनके प्रसिद्ध सांग थे-गोपीचन्द, शीलादे और पूरण भगत।

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में एक विशिष्ट प्रतिभा ने सांग के क्षेत्र में कदम रखा और यह प्रतिभा थे लोककवि छाजू राम के शिष्य सेरी खाण्डा (सोनीपत) निवासी दीपचन्द। पं. दीपचन्द संस्कृत के विद्वान थे। दीपचन्द के सांग प्रथम विश्व युद्ध के समय अपने यौवन पर थे। उन्होंने किशनलाल भाट द्वारा आरम्भ की पद्धति में अनेक परिवर्तन किए। दीपचन्द ने अंग्रेजी शासन के साथ भारत में आने वाले हारमोनियम को भी सांग वाद्यों में शामिल किया। उन्होंने कलाकारों और टेकियों की संख्या भी बढ़ा दी, जिनका काम था मुख्य सांगी या सांग के पात्रों द्वारा गाए गए आरम्भिक मुखड़ों को दोहराना। दीपचन्द के स्त्री पात्रों के आभूषण और वस्त्र-सज्जा थे – काले रंग का लहंगा उस पर धारू रंग की अंगिया और लाल रंग का ओढणा आदि। पं. दीपचन्द के प्रसिद्ध सांग थे – सोरठ, सरण दे, राजा भोज, नल दमयन्ती, गोपीचन्द, हरिश्चन्द्र, उत्तानपाद और ज्यानी चोर।

दीपचन्द के बाद सांगियों की परम्परा में कई व्यक्ति आते हैं उनके नाम इस प्रकार हैं – बाजे भगत (सिसाना), सरूपचन्द (दिसारखेड़ी), मानसिंह जोगी (सैदपुर), भरतु (भैंसरू), निहाल (नांगल), सूरजभान वर्मा (भिवानी), हुकमचन्द (किसमिनाना), धनसिंह जाट (पुठी), चितरू लुहार (सांपला गढ़ी) और गोरड़ निवासी हरदेवा। इन सभी कलाकारों ने लोक-कथाओं के माध्यम से दर्शकों के हृदय को भाव विभोर किया।

इस परम्परा में सबसे प्रमुख नाम आता है हरदेवा नामक सांगी का जो पं. दीपचन्द के शिष्य थे। उन्होंने सांग में स्वाभाविकता लाने का प्रयत्न किया। उन्होंने अपने गुरू दीपचन्द द्वारा स्थापित स्त्रीवेश का विरोध किया। श्री हरदेवा ने ‘काफिया’ छंद का परित्याग करके उसके स्थान पर रागनी का प्रयोग किया; जो आज तक प्रचलित है। हरदेवा के प्रमुख सांगों के नाम थे, हीरामल-जमाल, धरमकौर-रघबीर, हीर-रांझा और बीजा-सोरठ।

हरदेवा के शिष्य बाजे भगत (सुसाणा निवासी) भी हरियाणा के प्रमुख सांगियों में से एक थे। उनकी रागनियों में भक्ति व नीति की प्रधानता थी। उन्होंने साज-संगीत में काफी सुधार किया और सारंगी, ढोलक, नगाड़े तथा हारमोनियम के अनेक कुशल कलाकारों को मंच पर लेकर आए। उनके लोकप्रिय सांग थे, जमाल, रघबीर, चन्दकिरण और गोपीचन्द।

सांग की इस परम्परा में पं. लखमीचन्द (जांटी निवासी) विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए।  वे निरक्षर थे, परन्तु आस-पास के परिवेश को उन्होंने गहराई से समझा व अनुभव किया। बचपन में लोक कवि मानसिंह के भक्ति गीतों का लखमीचन्द पर विशेष प्रभाव पड़ा। पं. लखमीचन्द ने उनकी सेवा करते हुए उनके साथ गायन का अध्ययन किया और सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी सांग पार्टी की स्थापना की।

आरम्भ में पं. लखमीचन्द के सांगों को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हो पाई क्योंकि उनके सांगों में शृंगार प्रवृति अधिक पाई जाती थी। समाज में इस प्रकार के सांगों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। पं. लखमीचन्द ने इस बात को समझा और अपने दो विद्वान साथियों के साथ मिलकर पुराणों की कथाएं सुनी, उपनिषदों के प्रसंग सुने और अनेक दर्शनों की गुत्थियों की चर्चा करते हुए उनके ज्ञान को अपने भीतर आत्मसात किया। इस प्रकार उनकी शृंगारी प्रवृति पर आध्यात्मिकता का पुट चढ़ता चलता गया।

तत्पश्चात लखमीचन्द ने पौराणिक लोककथाओं से सम्बन्धित और अपनी कल्पना पर आधारित सांगों की रचना की और मनोहारी मंचन भी किया। उन्होंने लगभग 2500 रागनियों और 1000 नई लोकधुनों का विकास किया। उनके प्रसिद्ध सांग हैं – हरिश्चन्द्र मदनावत,नौटंकी, शाही लकड़हारा, नल-दमयन्ती, सत्यवान सावित्री, शकुन्तला, द्रोपदीचीर उत्तानपाद, भगतपूरणमल, हीर-रांझा, सेठ ताराचन्द, मीराबाई, पदमावत,  ज्यानीचोर, हीरामल जमाल और राजा भोज आदि।

पं. लखमीचन्द के बाद के सांगियों में नाम जुड़ता है मांगे राम (पुरपाणची) का।  मांगे राम जी ने ऐतिहासिक, पौराणिक, भक्ति, लौकिक गाथाओं से सम्बन्धित सांगों का डंका हरियाणा के गांव-गांव में बजाया। यही नहीं वे राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रेरित, सामाजिक जीवन से सम्बन्धित अभिनय भी अपने कला-मंच के माध्यम से करते थे। उनके प्रसिद्ध सांग थे- रूप बसंत, हकीकतराय, कृष्ण-जन्म, ध्रुवभगत, गोपीचन्द, भरथरी, चन्द्रहास, चापसिंह और शकुन्तला आदि। उनके सांगों की प्रसिद्धिी फिरोज जालंधर, अमृतसर, लाहौर, मुलतान और बन्नू के हाट तक के इलाकों तक पहुंच गई थी। मांगे राम के साथ-साथ लखमीचन्द के शिष्य, माईचन्द, सुलतान, रतीराम, चन्दन भी सांग करते थे।

मांगे राम जी के बाद चन्द्रदत्त बादी (दत्तनगर, दादरी) का नाम सांगी के रूप में उल्लेखनीय है। उन्होंने सांग में स्वाभाविकता लाने के उद्देश्य से अपनी मंडली में स्त्रियों को स्थान दिया, किन्तु यह सुधार सर्वमान्य न हो सका। इन्होंने दूसरा प्रयास किया टिकटों पर सांग दिखाने का, परन्तु उनका यह प्रयास भी कुछ समय के बाद असफल हो गया। ‘बीजा सोरठ’ उनके प्रसिद्ध सांग का नाम था। कई अन्य सांगों को भी उन्हें सांग मंच पर सफलता से मंचित किया।

मांगे राम के समकालीन सांगी निदाणा-निवासी धनपत सिंह हुए। धनपत सिंह की गायन शैली और अभिनय कहीं उत्तम थे, परन्तु रागनी-रचना की दृष्टि से मांगेराम अग्रणी थे। धनपत सिंह के प्रसिद्ध सांग थे-लीलोचमन, ज्यानी चोर, सत्यवान-सावित्री तथा बन-देवी। उनका लीलो चमन सांग, भारत विभाजन पर आधारित था जो राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित था। ‘सत्यवान-सावित्री’ सांग के माध्यम से उन्होंने नारी शक्ति को विशेष रूप से प्रेरित किया।

धनपत सिंह के बाद पं. रामकिशन ब्यास ने भी सन 1945 से 1990 तक इस परम्परा का बखूबी निभाया। ये सांग और रागनी के क्षेत्र में ‘व्यास जी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अनेक सांगों की रचना की और अभिनय भी किया। रामकिशन ब्यास की रचनाएं अत्यन्त लोकप्रिय रहीं। उनके सांग मंच को सुशोभित करेन वाले व्यक्ति थे उनके नक्कारची इम्मन, सारंगी उस्ताद-सब्बीर हुसैन, हारमोनियम मास्टर-ताहिर हुसैन प्यारे-ढोलकवादक आदि। रूपकला जादूखोरी, धर्मजीत, सत्यवान-सावित्री, हीरामल-जमाल और कम्मो कैलाश, रामकिशन ब्याज जी के प्रसिद्ध सांग थे। उनके सभी सांग लोकजीवन में प्रेमभावना और भक्तिभावना और सौन्दर्य भावना संचार करने वाले थे।

रामकिशन व्यास के समकालीन सांगी खिम्मा भी लगभग 60 वर्ष तक सांग परम्परा को निभाते रहे। ये बाजे भगत के शिष्य और गोरड़ निवासी हरदेवा के पुत्र थे। इन्होंने बाजे भगत की सांग प्रणाली को निभाया। परन्तु ये अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाए।

बाजे भगत के शिष्य हुश्यारे-प्यारे ने भी सांग परम्परा को निभाया। मांगे राम के शिष्य सरूपलाल व कपूर आदि ने भी कई वर्षों तक अपने गुरू के सांगों का मंचन किया। धनपत सिंह के शिष्य श्याम, गांव धरोधी (जींद), चन्दगीराम गांव भगाणा (हिसार), बनवारी ठेल, गांव मोखरा (रोहतक) आदि ने भी सांग की परम्परा को जीवित रखा। इसी शृंखला में रामकिशन व्यास के शिष्य पाल्लेराम, गांव खटकड़ (जींद) में भी अपने गुरू की परम्परा को आगे बढ़ाया। लखमीचन्द की प्रणाली में जो सांग मंचित हुए है वे उनके पुत्र तुलेराम और उनके शिष्य जहूर मीर के द्वारा किए गए हैं।

सांग की इस विकास प्रक्रिया ने हरियाणा की संस्कृति के विभिन्न पक्षों को उजागर किया है, लोक-कथाओं और पौराणिक आख्यानों, के माध्यम से इस परम्परा से लोगों को मनोंरंजन और अपनी संस्कृति का ज्ञान भी प्राप्त हुआ। उन्हें अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराओं व मूल्यों को सुरक्षित रखने का प्रेरणा भी मिली।  शिक्षा व समाज कल्याण के लिए लोगों को प्रेरित किया। समाजोन्मुखी कार्यों के लिए सांग को मान्यता मिली, दूसरी ओर क्षेत्रीय संस्कृति को भी यह संरक्षित रख पाया; इसके साथ-साथ यह समय के अनुरूप स्वस्थ मनोरंजन दे पाया। अधुनातन में वैज्ञानिक विकास के चलते मनोरंजन के साधनों का तेजी से विकास हुआ है जिसके चलते हुए परम्परागत साधनों के प्रति नई पीढ़ी उतनी रूचि नहीं ले रही। इसी कारण सांग जैसी परम्पराओं की समाज पर पकड़ कुछ कमजोर होती दिखाई दे रही है और धीरे-धीरे ऐसी विधाओं को संरक्षण देने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसलिए सरकार समाज के प्रबुद्ध नागरिक व सांस्कृतिक कलाकारों का ये दायित्व बनता है कि इस कला को विलुप्त न होने दे एवं इस दिशा में सामूहिक तौर पर प्रयास किया जाए, इसके लिए जहां नए-नए विषयों का चयन किया जा सकता है। दूसरी ओर इसकी प्रस्तुति की विधा भी आवश्यकतानुरूप विकसित की जा सकती है। सांग का सरंक्षण केवल एक विधा का संरक्षण नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों, विरासत तथा हरियाणा के जन-जीवन को गहराई से समझने का एक प्रयास है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर 2016) पेज-58-59

हरियाणवी संस्कृति का अनमोल रत्न-मास्टर सतबीर

नरेन्द्र कुमार 

मास्टर सतबीर द्वारा गाए सांग व किस्से

भगत सिंह,  सुभाष चन्द्र बोस, उधम सिंह, अंजना पवन, नल दमयन्ती, वीजा सोरठ, चापसिंह, जयमल फत्ता, पिंगला भरथरी, जानी चोर, शाही लकड़हारा, रूप बसन्त, सरवर नीर, कृष्ण सुदामा, कृष्ण जन्म, उतानपाद, भगत पूरणमल, हूर मेनका, चन्द्रहास, मोरध्वज, हीर रांझा, गोपीचन्द, चीर पर्व, विराट पर्व, सत्यवान सावित्री, लीलो चमन, पदमावत, चन्दकिरण, हीरामल जमाल, सेठ ताराचन्द, वीर विक्रमाजीत, नौरत्न, बणदेवी, वीर हकीकतराय, शिवजी का विवाह, हरनन्दी का भात, श्रवण कुमार, सती बपोला, गौतम बुद्ध, भूप पूरंजन, वीर सावरकर, जल करण, मीरा बाई, उषा अनिरूद्ध, रूक्मणी का विवाह, अजीत सिंह राजबाला, शकुन्तला दुष्यन्त, राजा हरिशचन्द्र, फूल सिंह नोटंकी, लख्मी का ब्रह्मज्ञान, मांगेराम का ब्रह्मज्ञान, जगदीश का ब्रह्मज्ञान, हरफूल जाट जुलानी, उपदेशक भजन

master satbir ji

सोनीपत जिले के गांव भैंसवाल कलां में जन्में मास्टर सतबीर हरियाणवी  संस्कृति के ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी गायन शैली के माध्यम से विभिन्न लेखको की रागनी व भजनो को घर घर तक पहुँचाया है। मास्टर सतबीर सिंह को  हजारों भजन व रागनियां याद थी । वे बहुत ही सुरीले व लयबद्ध गाने वाले कलाकार थे। उहनकी अदाकारी को देखने के लिए लोग बड़े चाव से इकटठा होते थे। मास्टर जी बहुत ही सीधे व सरल स्वभाव के इन्सान थे। वे बडे प्रेम से लोगो से पेश आते थे और बहुत ही मिलनसार थे। इन्हीं गुणों के कारण हर कोई उनसे प्यार करता था। इनके गाने के स्तर के इतना ऊँचा होने के फलस्वरूप हरियाणा सरकार ने उन्हें हरियाणा गोरव सम्मान से अलंकृत किया था।

मास्टर सतबीर का अधिकतर जीवन गाने व पढाने में ही व्यतीत हुआ। वे पी टी आई के पद पर थे और अध्यापन के दौरान उन्होंने भिन्न-भिन्न गांवों को अपनी सेवा दी। उनकी पहली तैनाती जौली गांव में हुई थी। वो रिवाड़ा और रभड़ा के सरकारी स्कूलों में भी तैनात रहे । 2009 में वो सेवानिवृत हुए। वे बहुत अच्छे खेल परीक्षक थे और उन्होंने योगेश्वर दत्त जैसे हीरे को तराशने का कार्य किया, जिस पर देश को नाज है।

मास्टर सतबीर ने बहुत से किस्से व भजन गाए हैं। वे किस्से व सांग में यथास्थान अपनी रागनी भी शामिल कर लिया करते थे । मास्टर सतबीर ने अपनी गायन शैली के माध्यम से हरियाणवी  संस्कृति को 45 से 50 वर्षों के करीब इसे निरन्तर चलायमान रखा। वे निरन्तर अभ्यासरत रहते थे, जिससे उनकी याददाश्त बहुत बढिय़ा थी। उन्हें कभी भूलते हुए नहीं देखा। उन्होंने बहुत से सांग व किस्सों की रीकार्डिंग की ताकि वो भविष्य में हमें अपनी संस्कृति को सहेज कर रखने में हमारी सहायता कर सकें।

मास्टर सतबीर जी मधुमेह से पीडि़त थे। किडनी खराब होने से रोहतक से नियमित डायलिसिस करवा रहे थे। सोमवार सुबह तेज बुखार के चलते उन्हेें गोहाना लाया गया जहां हस्पताल में उन्हे मृत घोषित कर दिया गया। 18 जुलाई 2016 सुबह के समय  हरियाणवी संस्कृति के इस इस अनमोल रत्न ने इस धरा पर अपनी अन्तिम सांस ली।

उनके परिवार में उनकी पत्नी कृष्णा देवीए बेटा संदीप, बेटियां ममता व राखी हैं। उनका पुत्र संदीप उनकी इस कला को निरन्तर आगे बढ़ा रहा है।

मा. नरेन्द्र कुमार, गांव कोथ कलाँ  (हिसार)

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर- अक्तूबर 2016), पेज- 57

 

जलियांवाळे बाग का मंजर

मनोज पवार ‘मौजी’

मेरी भोळी सूरत कांब गई, मैं छोड़ रै आपणी धीर गया
जलियांवाळे बाग का मंजर, मेरा काळजा चीर गया

दन-दनादन गोळी चाली, दुश्मन के औजारां तै
नर अर नारी भून दिए सब, गोळी की बौछारां  तै
मौत का नंगा नाच करिणयो, कित रै थारा जमीर गया

कोए मर्या पड़्या, कोए डर्या पड़्या, कोए पड्य़ा-पड़्या रै लोच रहया
कोए कुएं म्हं गिर्या पड़्या, कोए आपणे बाळक बोच रह्या
कोए खड़्या रै सोच रह्या, आज धरती पै तै सीर गया

हाथ पड़े किते पैर पड़ै, किते नाक, कान अर आंख पड़ी
याणे बाळक, बुढ्ढे, नारी, काया की दो फांक पड़ी
तन की कई छटांक पड़ी, टुकड़्या म्हं खिंड्या शरीर गया

सोनू नैगल क्युकर गाऊं, मेरा गळा रूंध जावै सै
डायर की करतूत देख कै, ‘मौजी’ कलम चलावै सै
‘माठड़े’ के हिरदे तै दिखे, आर-पार यू तीर गया

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज-38