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” झुकना मत “

” झुकना मत “

जैसे ही डाक्टर ने कहा
झुकना मत।
अब और झुकने की
गुंजाइश नही…
सुनते ही उसे..
हँसी और रोना ,
एक साथ आ गया।

ज़िंदगी में पहली बार वह
किसी के मुँह से सुन रही थी

डा. सुभाष सैनी – तरसा होगा वो जि़ंदगी के

ग़ज़ल


तरसा होगा वो जि़ंदगी के लिए
जिस ने सोचा है खुदकुशी के लिए

दुश्मनी क्यों किसी से की जाए
जि़ंंदगी तो है दोस्ती के लिए

देखकर कत्लो-खून  के मंज़र
हाथ उठते हैं बंदगी के लिए

आज के दौर में

हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी

हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी

कविता

मनुष्य
जीवनभर
तलाशता है सीढ़ी
ताकि छू सके
कोई ऊंची चोटी

एक ऊंचाई के बाद
तलाशता है दूसरी सीढ़ी
औ’ हर ऊंचाई के बाद
नकारता है
पहली सीढ़ी

सीढ़ी है
जो नहीं नकारती
अपना धर्म-कर्म
वह फिर सेवा के

हरभजन सिंंह रेणु- ठीक कहा तुमने

हरभजन सिंंह रेणु- ठीक कहा तुमने

कविता

तुमने ठीक ही कहा है-
जब हम तोड़ नहीं पाते
अपने इर्द-गिर्द की
अदृश्य रस्सियों के
अटूट जाल,
तब हम
दार्शनिक हो जाते हैं।

कहीं एकांत में
लोकगीत
नहीं रचते-गाते
मंत्र जपते पढ़ते हैं,
बंद कमरों में छिपकर
शब्दों